बाली बैनीवाल
तीन सौ मण चीणां गी माद एकली बरसां देंवती अर बिचाळै पाणी ई कोनी पींवती
9 साल की उम्र में गुडिया से परलीका ब्याहकर आई बाली बैनीवाल अब नब्बै के घर को लांघ चुकी है। अपने जमाने की यादों को ताजा करती हुई वे कहती हैं 'पैली गांवां में मालो लगावता। म्हारै गांव गै गुवाड़ में मालो पड़्यो रैंवतो। एक दिन कई जवान पितावै हा, पण मालो कोनी लाग्यो। पाणी ल्यांवती एक लुगाई थमी अर सिर पर घडिय़ै थकां ई मालो चक्यो अर घड़ै ऊपरकर लारनै बगागे मार्यो। जा जांवती खोखा खांवती। बा बगै'र बा बगै। बीं दिन पछै गांव गै मरदां मालै गै हाथ ई कोनी लगायो। मैं तीन सौ मण चीणां गी माद बरसां देंवती अर बिचाळै पाणी पीवण गो ई काम कोनी हो। काम तो मेरै नूं गो मैल हो। खेत गै राह में और नां तो काचर ई छोलबो करती। बे'ली तो मिन्ट ई कोनी रैंवती। खुराक होंवती चोखी। मैं आप आध सेर घी गो सीरो एकली खा ज्यांवती। 25 दिनां गो टाबर गोदी में लेगे हाड़ी काटण गई। अब तो राज ई लुगाइयां गो आग्यो। सारी चीजां गा ठाट होग्या। बां दिनां तंदूर गी राख नै घडिय़ै में घालगे पाणी गेर देंवता। पाणी नीतर ज्यांवतो तो बीं स्यूं गाबा धोंवता। पण अब तो सगळा साधन बापरग्या। पैली कोई कूमौत कोनी सुणता। फोड़ा सैन कर लेंवता पण मरता कोनी। काण-कायदो अर सरम-लिहाज बेसी राखता। बीते जमाने की बातों का अखूट खजाना अपने में सहेजे मौन बैठी बाली ने बोलना शुरु किया तो न तो उठने को मन हुआ और न खुद बोलने का। लोकजीवन की पूंजी को अपने में सहेजे ये हमारे बुजुर्ग हमारे साथ बतियाने को कितने बेताब हैं, ये तो वही जान सकता है जो इनके पास बैठ इनकी सुने। बात-बात में कहावतें, मुहावरे। लच्छेदार व आकर्षक भाषा के धनी इन बुजुर्गों से हमे विरासत में धन-सम्पदा के साथ-साथ संस्कार व भाषा को ग्रहण करने की लालसा भी रखनी चाहिए।











0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें