सत्तासी की उम्र में भी बरकरार किताब का जुनून
किताबां मेरी खुराक है। आ मिलबो करै तो मैं क्यांगै ई सारै कोनी।
-विनोद स्वामी
किताबां मेरी खुराक है। आ मिलबो करै तो मैं क्यांगै ई सारै कोनी।
-विनोद स्वामी
किताबें वक्त को उंगली पकड़ कर, सीढ़ियां चढ़ना सिखाती हैं।
सच तो ये है हर सदी में पीढ़ियों को, पीढ़ियां पढ़ना सिखाती हैं।।
सच तो ये है हर सदी में पीढ़ियों को, पीढ़ियां पढ़ना सिखाती हैं।।
परलीका के बुजुर्ग मनफूलाराम जाट को देखकर राजेश चढ्ढा की ये पंक्तियां बरबस ही
स्मरण हो आती हैं। दुनियाभर में विश्व पुस्तक दिवस मनाया जा रहा है और परलीका में ८७ वर्षीय बुजुर्ग मनफूलाराम इस सब से बेखबर अपनी धुन में कमलेश्वर का चर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' पढ़ने में लीन हैं। जीवन का संध्याकाल है।
स्मरण हो आती हैं। दुनियाभर में विश्व पुस्तक दिवस मनाया जा रहा है और परलीका में ८७ वर्षीय बुजुर्ग मनफूलाराम इस सब से बेखबर अपनी धुन में कमलेश्वर का चर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' पढ़ने में लीन हैं। जीवन का संध्याकाल है।हाथ-पैरों में सत नहीं रहा। जुबान लड़खड़ाती है, मगर आंखें और कान अब भी पूरी तरह सजग। पड़ोसी बताते हैं, मनफूलाराम ने अपने जीवन में फुरसत का हर पल किताबों के साथ गुजारा है। उनको अकेले बैठे देख हर कोई यही सोचता होगा कि यह बू़ढा इस उम्र में आखिर कौनसी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। मगर यह बू़ढा तो साहित्य की दुनियां में गोते लगाता खुद को पूरी दुनियां से जोड़े है।
वि. सं. 1978 में जनमे मनफूलाराम उस जमाने में चार तक पढ़ाई कर पटवारी बने, मगर नौकरी रास नहीं आई तो किसानी करने लगे। उन्होंने पहली किताब कौनसी व कब पढ़ी, ये तो उन्हें याद नहीं पर जब से होश संभाला उनका पढ़ना बदस्तूर जारी है। शुरू में उन्होंने धार्मिक किताबों का अध्ययन किया। रामायण, महाभारत, गीता और शिवपुराण जैसे ग्रंथों को कई-कई बार भी पढ़ा। ज्योतिष में रूचि होने के कारण लोग-बाग जब पंचांग संबंधी कोई बात पूछने आते तो लगे हाथों पढ़ी जा रही किताब का कुछ अंश उनको भी सुना देते। स्कूल लायब्रेरी से भी लाकर किताबें पढ़ते। जिसमें राजनीति, नैतिक शिक्षा से लेकर ज्ञान-विज्ञान तक सभी प्रकार की किताबें होतीं। स्थानीय बाजारों में उनकी रूचि की किताबें उपलब्ध नहीं रहीं और दूर-दराज जाने का अवसर ही न मिला। और कुछ न मिला तो बच्चों से पाठ्यपुस्तकें ही मांग-मांग कर पढ़ लेते। मगर जैसे ही गांव में साहित्यिक गतिविधियों ने जोर पकड़ा तो मानो उन्हें अपना खोया हुआ खजाना मिल गया।
खुद बू़ढे होते जा रहे हैं मगर किताबों को पढ़ने की भूख दिन-दिन जवान। उन्होंने आज ही कमेलश्वर का 'कितने पाकिस्तान' शुरू किया है। राजस्थानी और हिन्दी की कई सौ किताबें पढ़ी हैं। किन-किन का जिक्र किया जाए, वे तो सभी किताबों को अनमोल बताते हैं। उनका मानना है कि साहित्य तो सही राह दिखाता है और आदमी को इंसान बनाता है। बिज्जी की 'बातां री फुलवाड़ी' के सारे भाग, मुंशी प्रेमचंद समग्र, यशपाल का 'झूठा-सच' राही मासूम रजा का 'आधा गांव' सहित जो भी सुलभ हुआ पढ़ डाला। सुबह चाय के बाद खाना खाने तक पढ़ना अब उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा है। दोपहर को आराम के बाद शाम तक भी वे पढ़ते देखे जाते हैं। आजकल उनको बोलने में परेशानी होती है। फिर भी वे बताते हैं- 'किताब सदां सूं आछी लागै, अबी जी करै जाणै सारै दिन पढ़ूं पण बैठ्यो कोनी रैइजै। फेर ई मन कोनी मानै। किताब तो आदमी नै फिल्टर करै। बीं री बुराइयां नै रोक गे माणस बणावै अर भोत भांतगो ग्यान बधै जिको न्यारो। किताबां मेरी खुराक है। आ मिलबो करै तो मैं क्यांगै ई सारै कोनी। पैली थारै बरगां कनै ऊं जागे लियांवतो। अब तो ऐ टाबरिया ल्यागे द्यै जिसी बांचल्यां।' वे अपनी दस वर्षीय पोती की ओर इसारा कर बताते हैं।
ताज्जुब तो यह है कि किताब के प्रति इतना मोह रखने वाले मनफूलाराम रेडियो व टीवी के बिलकुल भी शौकीन नहीं। उनका मानना है कि किताब में जो आंनद है वह अन्यत्र दुर्लभ है। स्थानीय साहित्यकारों के पास उन्हें किताबें सहज सुलभ हो जाती हैं और वे उन्हें पढ़ते ही लौटा देते हैं।
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''मेरी याद आणी में मैं रोज आं नै पढतां देख्या है। कई बारी पूछल्यां तो मुळक गे बोलै, बांचां हा भाई! एक चोखी किताब हाथ आई है आज तो। आं नै देख-देखगे बांचण नै तो म्हारो ई जी करै, पण फोरो कठै!"
-भानीराम खाती (परलीका के उपसरपंच और मनफूलाराम के पड़ोसी)
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